मांगलिक दोष क्या है?
जब मंगल कुंडली के पहले, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में हो, तो कुंडली मांगलिक कहलाती है। अधिकतर ज्योतिषी इसे लग्न से, और चंद्र व शुक्र से भी देखते हैं; कुछ परंपराएँ दूसरा भाव भी जोड़ती हैं।
यह कितना आम है?
बहुत आम। मूल नियम से मंगल बारह में से पाँच भावों में आता है, इसलिए केवल लग्न से ही लगभग दस में से चार कुंडलियाँ मांगलिक होती हैं।
चार आम भ्रम
- “मांगलिक का विवाह मांगलिक से ही हो।” दोनों मांगलिक हों तो परंपरा में मिलान ठीक माना जाता है, पर यही एकमात्र रास्ता नहीं; कई बार दोष का परिहार हो जाता है।
- “मांगलिक विवाह असफल होगा।” नहीं। मंगल पूरी कुंडली का एक पहलू है; सप्तम भाव, शुक्र और चल रही दशा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
- “28 वर्ष के बाद दोष समाप्त।” कुछ परंपराएँ ऐसा मानती हैं। इसे परंपरा समझें, नियम नहीं।
- “गुण अंक से सब तय हो जाता है।” 36 गुण मिलान में मांगलिक जाँच शामिल नहीं; दोनों साथ देखे जाते हैं।
परिहार कब होता है?
शास्त्रों में कई परिहार बताए गए हैं, जैसे मंगल अपनी राशि (मेष, वृश्चिक) में या उच्च (मकर) में हो, मंगल पर गुरु की दृष्टि हो, या दोनों मांगलिक हों। परिहार लागू है या नहीं, यह पूरी कुंडली से तय होता है।
उपाय
परंपरा में मंगल शांति पूजा, मंगलवार को हनुमान जी की उपासना और कुछ परिवारों में कुंभ विवाह जैसे उपाय बताए जाते हैं। उपाय दोनों कुंडलियाँ देखने के बाद ही चुना जाता है।
विवाह से पहले क्या करें
दोनों कुंडलियाँ साथ पढ़वाएँ: गुण अंक, दोनों की मांगलिक जाँच, सप्तम भाव और दशा। इसके लिए 30–60 मिनट का कुंडली मिलान सत्र उपयुक्त है।
सामान्य प्रश्न
क्या 36 गुण मिलान में मांगलिक दोष शामिल है?
नहीं। गुण मिलान और मांगलिक जाँच अलग हैं; अच्छे मिलान के लिए दोनों ज़रूरी हैं।
क्या मांगलिक का विवाह ग़ैर-मांगलिक से हो सकता है?
अक्सर हाँ, जब किसी कुंडली में दोष का परिहार हो या दूसरे पहलू मज़बूत हों। यह दोनों पूरी कुंडलियों पर निर्भर है।





